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Hindi Project III

कुछ और कवितायेँ।

Badal raag

झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर। 
राग अमर! अम्बर में भर निज रोर

झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में
घर, मरु, तरु-मर्मर, सागर में
सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में
मन में, विजन-गहन-कानन में
आनन-आनन में, रव घोर-कठोर
राग अमर! अम्बर में भर निज रोर

अरे वर्ष के हर्ष
बरस तू बरस-बरस रसधार
पार ले चल तू मुझको
बहा, दिखा मुझको भी निज 
गर्जन-भैरव-संसार

उथल-पुथल कर हृदय
मचा हलचल
चल रे चल
मेरे पागल बादल

धँसता दलदल 
हँसता है नद खल्-खल् 
बहता, कहता कुलकुल कलकल कलकल। 

देख-देख नाचता हृदय 
बहने को महा विकल-बेकल
इस मरोर से- इसी शोर से
सघन घोर गुरु गहन रोर से 
मुझे गगन का दिखा सघन वह छोर
राग अमर! अम्बर में भर निज रोर!


……………………………………
मेघ आये बड़े बन-ठन के, सँवर के।
आगे-आगे नाचती – गाती बयार चली
दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगी गली-गली
पाहुन ज्यों आये हों गाँव में शहर के।
पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाये
आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाये
बांकीचितवन उठा नदी, ठिठकी, घूँघट सरके।
बूढ़े़ पीपल ने आगे बढ़ कर जुहार की
बरस बाद सुधि लीन्ही
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के।
क्षितिज अटारी गदरायी दामिनि दमकी
क्षमा करो गाँठ खुल गयी अब भरम की
बाँध टूटा झर-झर मिलन अश्रु ढरके
मेघ आये बड़े बन-ठन के, सँवर के।
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मेघदूत 

कालिदास 



पूर्वमेघ
कश्चित्‍कान्‍ताविरहगुरुणा स्‍वाधिकारात्‍प्रमत:
     शापेनास्‍तग्‍ड:मितमहिमा वर्षभोग्‍येण भर्तु:।
यक्षश्‍चक्रे जनकतनयास्‍नानपुण्‍योदकेषु
     स्निग्‍धच्‍छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।।
कोई यक्ष था। वह अपने काम में असावधान
हुआ तो यक्षपति ने उसे शाप दिया कि
वर्ष-भर पत्‍नी का भारी विरह सहो। इससे
उसकी महिमा ढल गई। उसने रामगिरि के
आश्रमों में बस्‍ती बनाई जहाँ घने छायादार
पेड़ थे और जहाँ सीता जी के स्‍नानों द्वारा
पवित्र हुए जल-कुंड भरे थे।

               2
तस्मिन्‍नद्रो कतिचिदबलाविप्रयुक्‍त: स कामी
      नीत्‍वा मासान्‍कनकवलयभ्रंशरिक्‍त प्रकोष्‍ठ:
आषाढस्‍य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्‍टसानु
      वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।
स्‍त्री के विछोह में कामी यक्ष ने उस पर्वत
पर कई मास बिता दिए। उसकी कलाई
सुनहले कंगन के खिसक जाने से सूनी
दीखने लगी। आषाढ़ मास के पहले दिन पहाड़ की
चोटी पर झुके हुए मेघ को उसने देखा तो
ऐसा जान पड़ा जैसे ढूसा मारने में मगन
कोई हाथी हो।

               3
तस्‍य स्थित्‍वा कथमपि पुर: कौतुकाधानहेतो-
     रन्‍तर्वाष्‍पश्चिरमनुचरो राजराजस्‍य दध्‍यौ।
मेघालोके भवति सुखिनो∙प्‍यन्‍यथावृत्ति चेत:
     कण्‍ठाश्‍लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्‍थे।।
यक्षपति का वह अनुचर कामोत्‍कंठा
जगानेवाले मेघ के सामने किसी तरह
ठहरकर, आँसुओं को भीतर ही रोके हुए देर
तक सोचता रहा। मेघ को देखकर प्रिय के पास में सुखी
जन का चित्त भी और तरह का हो जाता
है, कंठालिंगन के लिए भटकते हुए विरही
जन का तो कहना ही क्‍या?

               4
प्रत्‍यासन्‍ने नभसि दयिताजीवितालम्‍बनार्थी
      जीमूतेन स्‍वकुशलमयीं हारयिष्‍यन्‍प्रवृत्तिम्।
स प्रत्‍यग्रै: कुटजकुसुमै: कल्पितार्घाय तस्‍मै
      प्रीत: प्रीतिप्रमुखवचनं स्‍वागतं व्‍याजहार।।
जब सावन पास आ गया, तब निज प्रिया
के प्राणों को सहारा देने की इच्‍छा से उसने
मेघ द्वारा अपना कुशल-सन्‍देश भेजना चाहा।
फिर, टटके खिले कुटज के फूलों का
अर्घ्‍य देकर उसने गदगद हो प्रीति-भरे
वचनों से उसका स्‍वागत किया।




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आ: धरती कितना देती है / सुमित्रानंदन पंत

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे 
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा ! 
पर बन्जर धरती में एक अंकुर फूटा
बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला  
सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये  

मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर  
मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे
ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था  

अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे  
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने 
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई 
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन  

' जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये 
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर 
मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की 
गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर 
बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे  
भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों  

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जूही की कली
विजन-वन-वल्लरी पर 

सोती थी सुहागभरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न-

अमल-कोमल-तनु-तरुणी-जूही की कली,

दृग बन्द किये, शिथिल-पत्रांक में। 



वासन्ती निशा थी;

विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़ 

किसी दूर देश में था पवन 

जिसे कहते हैं मलयानिल। 

आई याद बिछुड़ने से मिलन की वह मधुर बात,

आई याद चाँदनी  की धुली  हुई आधी रात

आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,

फिर क्या? पवन 

उपवन-सर-सरित गहन-गिरि-कानन 

कुञ्ज-लता-पुंजों को पारकर 

पहुँचा जहां उसने की केलि 

कली-खिली-साथ। 

सोती थी,

जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह?

नायक ने चूमे कपोल,

बोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल। 

इस पर भी जागी नहीं,

चूक-क्षमा मांगी नहीं,

निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूंदे रही-

किम्वा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये 

कौन कहे?

निर्दय उस नायक ने 

निपट निठुराई की,

कि झोंकों की झड़ियों से 

सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,

मसल दिये गोरे कपोल गोल,

चौंक पड़ी युवति-

चकित चितवन निज चारों ओर पेर,

हेर प्यारे की सेज पास,

नम्रमुख हंसी, खिली 

खेल रंग प्यारे संग। 

thanks for visiting this page.


Suryanshgr. All right reserverd .

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